बीकानेर: उत्सवों की चमक के पीछे छिपता सच और बदलाव की पुकार
बीकानेर: उत्सवों का शोर और सिसकता धरातल
सिर्फ विमर्श से नहीं, संकल्प और क्रियान्वयन से बदलेगी मरुधरा की तस्वीर

बीकानेर—एक ऐसा शहर जिसकी रगों में रस्मों का उल्लास, हवेलियों का स्वाभिमान और मेलों की मिठास बहती है। आज यहाँ का आकाश गोष्ठियों, संवादों और बैठकों के शोर से भरा हुआ है।
अखबार की सुर्खियाँ विकास के दावों से सजी होती हैं और सोशल मीडिया ‘सेल्फी’ और ‘चेक-इन’ से गुलजार है। लेकिन जब हम इन पोस्टरों और नारों की परत हटाकर देखते हैं, तो एक थका हुआ और उपेक्षित बीकानेर नजर आता है।
दिखावे की चमक बनाम हकीकत का अंधेरा
बौद्धिक वर्ग एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर शहर के पुनरुद्धार की रूपरेखा तो बनाता है, लेकिन प्रश्न यह है कि वह ‘ब्लूप्रिंट’ गलियों की धूल तक पहुँचते-पहुँचते धुंधला क्यों हो जाता है?
बीकानेर आज दो पाटों के बीच पिस रहा है:
एक तरफ भव्य आयोजनों का दिखावा है, तो दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं का अभाव।
बीमार सड़कें और जख्मी सफर:
शहर की सड़कें अब मार्ग नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं के आमंत्रण पत्र बन गई हैं। उखड़ती डामर और धूल के गुबार आमजन की नियति बन चुके हैं।
रेलवे फाटक: थमती रफ्तार:
घंटों फाटकों पर रुकना यहाँ की दिनचर्या है। फ्लाईओवर और समाधानों की फाइलें दफ्तरों में धूल फांक रही हैं, जबकि जनता का कीमती समय और ईंधन सड़क पर धुआँ हो रहा है।
गंदगी और आवारा पशु
‘प्लास्टिक मुक्त बीकानेर’ का नारा केवल कागजों पर सिमट गया है। कचरे के ढेर और सड़कों पर लड़ते निराश्रित पशु न केवल शहर की सुंदरता को दागदार कर रहे हैं, बल्कि मासूमों की जान के दुश्मन भी बने हुए हैं।
सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सरोकार: एक चेतावनी
बीकानेर की पहचान यहाँ की ऐतिहासिक हवेलियाँ हैं, जो आज संरक्षण के अभाव में अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं। पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद हम पर्यटकों को वह अनुभव नहीं दे पा रहे, जिसकी यह नगरी हकदार है।
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उससे भी भयावह है समाज के भीतर पनपता नशे का जाल और बढ़ता अपराध।
चाकू-छुरे की धार से कटती गर्दनें इस बात का प्रमाण हैं कि हमारा प्रशासन और नागरिक बोध, दोनों ही गहरी नींद में हैं।
समाधान: चिंतन से क्रियान्वयन की ओर
सजावट, फोटो और अखबारों में छपती खबरों से शहर नहीं बदलता। बदलाव के लिए तीन स्तंभों की आवश्यकता है:
सामूहिक जवाबदेही:
बौद्धिक वर्ग चिंतन करे, लेकिन आम नागरिक को निगरानी और श्रमदान के लिए धरातल पर उतरना होगा।
प्रशासनिक इच्छाशक्ति:
सिर्फ ‘मीटिंग्स’ की औपचारिकता से निकलकर अधिकारियों को जवाबदेही तय करनी होगी। योजनाओं को बजट से बाहर निकालकर सड़क पर दिखाना होगा।
राजनीतिक प्रतिबद्धता:
बीकानेर को वोट बैंक के चश्मे से नहीं, बल्कि एक विरासत के रूप में सहेजने की जरूरत है।
बीकानेर की सांस्कृतिक आत्मा तभी सुरक्षित रहेगी जब उसका शरीर (आधारभूत ढांचा) स्वस्थ होगा। उत्सवों का ढोल तब और सुरीला लगेगा जब रेल फाटकों की समस्या सुलझेगी, नशामुक्त गलियाँ होंगी और हवेलियों को उनका खोया सम्मान मिलेगा।
अब समय गोष्ठियों का नहीं, ‘ग्राउंड वर्क’ का है।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी—जब शहर उजड़ रहा था, तब हम केवल आयोजन कर रहे थे?
परिवर्तन के लिए केवल एक चिंगारी की जरूरत है—
क्या हम उस क्रियान्वयन की शुरुआत करने को तैयार हैं?
क्या हम अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछने को तैयार हैं?
क्या हम शासन-प्रशासन से जवाबदेही मांगने को तैयार हैं?
क्या वाकई हम बीकानेर की बुनियाद के लिए प्रतिबद्ध हैं?

अगर हाँ तो…
उम्मीद है मेरा बीकानेर अब सजेगा, हमारा बीकाणा अब संवरेगा..!
सम्पत सारस्वत ब्रामणवाली
समीक्षक, प्रसार भारती, नई दिल्ली
संस्थापक, इको भारत
📧 sampatofficials@gmail.com




