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पुण्य प्रदात्री मकर संक्रांति 2026: तिथि, पुण्यकाल, धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व

पुण्य प्रदात्री मकर संक्रांति 2026: तिथि, पुण्यकाल, धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व

बीकानेर (श्रेयांस बैद)……..संवत् २०८२ माघक कृष्ण द्वादशी 15 जनवरी 2026 गुरुवार।

इस बार तिथि काल और सूर्य-पृथ्वी की गति के कारण एक बार फिर मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी 2026 गुरुवार को मनाया जाएगा मकर संक्रांति 14 या 15 जनवरी को,निर्णय सिन्धु के अनुसार मकर सक्रान्ति का पुण्यकाल सक्रान्ति से ३० घटी बाद तक होता है ये बता रहे हैं उत्तर प्रदेश से पंडित अनंत पाठक ……..किन्तु सूर्यास्त के बाद मकर सक्रान्ति प्रदोष काल रात्रि काल में हो तो पुण्यकाल दूसरे दिन ४० घटी माना जाता है।

काशी के प्रसिद्ध महावीर एवं ऋषिकेश पंचांग के अनुसार इस वर्ष भगवान सूर्य देव 14 जनवरी बुधवार को रात्रि 09 बजकर 25 मिनट पर धनु से मकर मकर राशि में प्रवेश करेगें।

पुण्य प्रदात्री मकर संक्रांति 2026: तिथि, पुण्यकाल, धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व

धर्म सिंधु के मतानुसार..

मकरे पराश्चत्वारिंशत्।।

इदं मकर कर्कातिरिक्तं सर्वत्र रात्रिसंक्रमे ज्ञेयम् ॥

अयने तु मकरे रात्रि संक्रमे सर्वत्र परदिनमेव पुण्यम् ॥

अर्थात- मकर में रात्रि को संक्रांति होय तो सर्वत्र परदिन(दूसरे दिन) में पुण्यकाल माना जाता है। अतः इस वर्ष उदया तिथि में संक्रांति आरम्भ होने के कारण 15 जनवरी गुरुवार के दिन संक्रान्ति का पर्व दिन मे 12 बजकर 26 मिनट तक मनाया जाना ही शास्त्रोचित है।

पुण्य प्रदात्री मकर संक्रांति 2026: तिथि, पुण्यकाल, धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व

मकर संक्रांति हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार है। चाहे वह महाभारत के समय की बात हो या फिर रामायण काल की बात हो या फिर अन्य पौराणिक ग्रन्थ हो, कहीं न कहीं मकर संक्राति का किसी न किसी रूप में वर्णन मिलता है। गोस्वामी तुलसी दास जी श्री रामचरित्र मानस में लिखते है- माघ मकर गति जब रवि होई।

तीरथपतिहिं आव तहाँ सोई। अर्थात् जब माघ के महीने में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो सभी तीर्थो के स्वामी गंगा व प्रयाग में जन कल्याण हेतु रहते है। अर्थात् संक्रांति काल में स्नान दान का बड़ा महत्व हो जाता है। इसी प्रकार महाभारत काल में भीष्म पितामह जी ने भगवान भास्कर के उत्तरायण होने तक अपने शरीर को शर शैया पर रखते हुए भी देह त्याग नहीं किया।

भगवान भास्कर के मकर राशि मे प्रवेश करते ही उनकी गति उत्तरायण हो जाती है। जिससे समूचे वातावरण में अद्वितीय सकारात्मक ऊर्जा रहती है। साथ ही बैकुण्ठ के द्वार खुल जाते हैं। अतः उत्तरायण सूर्य होने पर पितामह जी ने स्वर्ग को प्राप्त किया।

क्योंकि उत्तरायण को देव काल भी कहा जाता है। अतः इस पुण्यकाल में शान्ति, पुष्टि सहित यज्ञादि कर्म सहित विवाह संस्कारों के शुभ अवसर प्रारंभ हो जाते हैं।

 

जानिए क्यों मनाई जाती हैं मकर संक्रांति:- पाठक

मकर संक्रांति का जितना धार्मिक महत्व हैं, उतना ही वैज्ञानिक महत्व भी है। इस काल में गगांदि नदियों में पवित्र नदियों का जल प्रवाहित होते हुए नाना औषधियों से युक्त रहता है। जिससे चर्मादि रोगों से छुटकारा रहता है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी मकर संक्रांतिका बड़ा महत्व है। इस दौरान सूर्य मकर राशि में संक्रमण करते है। जिससे इसे मकर संक्रांति कहते है।

सूर्य का शनि राशि में प्रवेश बड़ा भी प्रभावशाली है। क्योंकि ज्योतिषीय गणनाओं में भगवान सूर्य की उत्तरायण गति इसी राशि से मानी जाती है। यद्यपि आकाशीय ग्रह गोचर में ग्रहों का विभिन्न राशियों में प्रवेश होता रहता है। यद्यपि सूर्य का राशि प्रवेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः भगवान सूर्य विभिन्न राशियों में यथा समय संक्रमण करते रहते हैं। अर्थात् ग्रहों के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश स़ंक्रांति का समय कहलाता है। जिसका अर्थ संक्रमण से है।जिसे संक्राति की संज्ञा दी जाती है। अर्थात् इस दौरान वातावरण सकारात्मक रहता है।

कृषि प्रधान भारत देश में धरा फसलों से परिणूर्ण रहती है। जिससे किसान सहित देश के लोग प्रसन्न रहते हैं। शीत ऋतु होने से विभिन्न प्रकार के खाद्य मेवे का सेवन रेवड़ी, गजक, मूंमफली, लाई, चने, ज्वार, बाजरा, मक्का, तिल सहित विविध प्रकार के धान्यों का सेवन सेहत के लिहाज से बढ़िया रहते हैं।

उदाहारण के लिए इस त्यौहार के आगमन से जन मानस कपकंपाती शीत से बचने हेतु गर्म धान्यों का परस्पर उपहार व दान देते हैं। गंगादि तीर्थों में स्नान जहां तन को स्वच्छ रखते हैं, वहीं गर्म धान्यों के प्रयोग तन को तंदुरूस्त रखते हैं।

पुण्य प्रदात्री मकर संक्रांति 2026: तिथि, पुण्यकाल, धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व

मकर संक्रांति के अवसर पर गंगादि तीर्थों में स्नान का बड़ा ही महत्व होता है। इस दौरान सूर्य के उत्तरायण होने तथा माघ मास होने से पौराणिक ग्रथों के अनुसार तीर्थों में स्नान से जन्म-जमान्तर के पाप समाप्त होते हैं, रोगों, दु‘खों, पीड़ाओं से छुटकारा होता है, जीवन को सुखद व संतुलित पथ प्रदान होता है। गंगादि तीर्थों की पवित्रता से व्यक्ति तन को सुन्दर व मन को पवित्र बनाते हैं।

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गंगादि तीर्थों के सेवन इस मकर संक्रांति के अवसर पर सभी स्त्री पुरूषों को मनोवांछित फल देने वाले कहे हैं। इस मकर संक्रांति को भारत ही नहीं, बल्कि विदेश सहित पास के देश नेपाल में भी मनाया जाता है। यह उत्तर-प्रदेश में खिचड़ी, पंजाब, हरियाणा में लोहड़ी इसी प्रकार अन्य प्रांतों में लोगों द्वारा इसे विविध रूप नामों से बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

इस त्यौहार के अवसर पर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा आदि विभिन्न प्रदेशों सहित सम्पूर्ण भारत के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ गंगादि तीर्थों में स्नान व विविध प्रकार की खाद्य पदार्थों गर्म कपड़ों का दान दे अपने जीवन को धन्य बनाते हुए पुण्य के भागी बनते हैं।

इस महान पर्व के अवसर पर इलाहाबाद में माघ मेले का आयोजन होता है। इस पुण्य पर्व पर देश के विभिन्न स्थानों में मेले, कुश्ती के आखाड़ों का आयोजन होता है। जिसमे बंगाल का गंगा सागर का मेला सुप्रसिद्ध है। इस संक्रांति में गंगासागर में स्नान की अद्भुत महिमा है।

पदमपुराण के अनुसार इस संक्रान्ति में दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान सूर्य को लाल वस्त्र, गेंहू, गुड़, मसूरदाल, तांबा, स्वर्ण, सुपारी, लालफल, लालफूल, नारियल, दक्षिणा आदि सूर्य दान का शास्त्रों में विधान है। इस संक्रान्ति के पुण्य काल में किये गये दान-पुण्य सामान्य दिन के दान-पुण्य से करोड़ गुना फल देने वाले होता है।

इस दिन धृत, कम्बल के दान का भी विशेष महत्व हैं। इस दिन किया गया दान, जप, तप, श्राद्ध तथा अनुष्ठान आदि का दो-गुना महत्व है। इस दिन इस व्रत को खिचड़ी कहते है। इसलिये इस दिन खिचड़ी खाने तथा खिचड़ा तिल दान देने का विशेष महत्व है।

इसी दिन से ही सभी शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है इस दिन व्रत रखकर, तिल, कंबल, सर्दियों के वस्त्र- आंवला- खिचड़ी-नमक -तिल व तिल के लड्डू आदि दान करने का विधि-विधान है। आज के दिन सूर्य अपने पुत्र शनी की मकर राशि मे आयेगा शास्त्रों में सूर्य को राज, सम्मान और पिता का कारक कहा गया है। और सूर्य पुत्र शनि देव को न्याय और प्रजा का प्रतीक माना गया है।

ज्योतिष शास्त्र में जिन व्यक्तियों की कुण्डली में सूर्य-शनि की युति हो, या सूर्य -शनि के शुभ फल प्राप्त नहीं हो पा रहे हों, उन व्यक्तियों को मकर संक्रान्ति का व्रत कर, सूर्य-शनि के दान करने चाहिए।

ऎसा करने से दोनों ग्रहों कि शुभता प्राप्त होती है। इसके अलावा जिस व्यक्ति के संबन्ध अपने पिता या पुत्र से मधुर न चल रहे हों, उनके लिये भी इस दिन दान-व्रत करना विशेष शुभ रहता है पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं। शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।

मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। यह भी कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

यशोदा जी ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था तब सूर्य देवता उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ। इस शुभ दिन इसलिए कई लोग व्रत धारण करते हैं।

मत्स्य पुराण के अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन सूर्योपासना के साथ यज्ञ, हवन एंव दान को पुण्य फलदायक माना गया है। ’’शिव रहस्य ग्रन्थ’’ में मकर संक्रान्ति के अवसर पर हवन पूजन के साथ खाद्य वस्तुओं में तिल एवं तिल से बनी वस्तुओं का विशेष महत्व बताया गया है। पुराणों के अनुसार मकर संक्रान्ति सुःख शान्ति, वैभव, प्रगति सूचक, जींवों में प्राण दाता, स्वास्थ्य वर्धक, औषधियों के लिए वर्णकारी एवं आयुर्वेद के लिए विशेष है।

संक्रान्ति काल मे शादी, मैथुन, तेल मर्दन, छौर कर्म, नए कार्यों की शुरूआत नहीं करना चाहिए। आज संक्रांति के समय में तीर्थ या फिर धर्म स्थानों मे गुड़, घी, चिनी, आदि का दान करना धर्म व पुण्य लाभ देने वाला तथा लोक परलोक को सुधारने वाला रहता है। अगर संक्रांति के शुभाशुभ फल का विचार करे, तो यह अपने ग्रह नक्षत्रों के अनुसार शुभाशुभ फल को देने वाली रहती है।

पुण्य प्रदात्री मकर संक्रांति 2026: तिथि, पुण्यकाल, धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व

 

मकर संक्रांति पर क्या दान करे?

मकर संक्रांति के दिन नए बर्तन, गर्म कपडे़, सुहाग का सामान, गुड़, तिल, सुखी खिचड़ी, भूमि का दान, गाय को चारा, घोडे़ को घांस खिलाने से लाभ होता है

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