पिंक फेस्ट में उभरी राजस्थानी भाषा मान्यता की पीड़ा व संवेदनाएं, साहित्यकारों ने रखी भाषा की ठसक
नक्से सूं मिटता गया नांव, म्हारा गांव बणग्या हिरोशिमा अर नागासाकी-बिजारणियां
तूं ही बता नहर, हम पानी लाए थे कि जहर -रूंख
लूणकरणसर, (श्रेयांस बैद):राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (आरआईसी) में आयोजित ‘पिंक फेस्ट’में राजस्थानी भाषा की मिठास और साहित्य की गहराई का संगम देखने को मिला।


जहां लूणकरणसर क्षेत्र के साहित्यकार राजूराम बिजारणियां और डॉ.हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख’ ने अपनी भाषा की ठसक और संवेदनाओं की छाप छोड़ी। फेस्ट में शनिवार को राजूराम बिजारणियां के संयोजन में आयोजित ‘राजस्थानी भाषा साहित्य: इस पड़ाव पर’ विषय पर परिचर्चा में विद्वानों ने भाषा के अस्तित्व और उसकी विकास यात्रा पर मंथन किया।
● भाषा के भविष्य पर गहन मंथन
वरिष्ठ साहित्यकार वेदव्यास की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में राजस्थानी भाषा की वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा की गई।
सत्र के संयोजक राजूराम बिजारणियां ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मायड़ भाषा जन्मघुंटी में मिली भाषा है।
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डॉ.हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख ने कहा कि “राजस्थानी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का आधार है।’ साथ ही उन्होंने राजस्थानी कहानी के पक्षों पर खुलकर चर्चा की। शारदा कृष्ण ने राजस्थानी महिला लेखन और मेवाराम गुर्जर ने कविता पर अपने विचार साझा किए।

◆ विस्थापन और संवेदनाओं की गूँज
परिचर्चा से पूर्व आयोजित ‘पोएट्री सिम्फोजियम’ में कविताओं ने श्रोताओं के दिलों को झकझोर दिया। राजूराम बिजारणियां ने “नक्से सूं मिटता गया नांव, म्हारा गांव बणग्या हिरोशिमा अर नागासाकी।” कविता में विस्थापन के दर्द को उकेरा। उनकी कविताओं ने घर-आँगन छूटने की पीड़ा और जड़ों से दूर होने की छटपटाहट को जीवंत कर दिया।
वहीं डॉ.हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख‘ ने ‘तूं ही बता नहर, हम पानी लाए थे कि जहर’, ऊंट’ सीरीज की कविताओं में राजस्थान के प्रतीक ऊंट के घटते अस्तित्व और उससे जुड़ी मानवीय संवेदनाओं को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में बोधि प्रकाशन के माया मृग ने सभी अतिथियों और वक्ताओं का सम्मान किया।
पिंक फेस्ट में उभरी राजस्थानी भाषा मान्यता की पीड़ा व संवेदनाएं, साहित्यकारों ने रखी भाषा की ठसक


