🌸 Udaipur:आत्मवाद को मानकर पापाचरणों से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण🌸
– उदयपुर में त्रिदिवसीय प्रवास सुसम्पन्न, ज्योतिचरण आगे गतिमान, 11 किमी विहार कर पहुंचे बिलोता
🌼 उदयपुर में अध्यात्म का स्पंदन

उदयपुर (श्रेयांस बैद ):जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा के प्रणेता और युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने त्रिदिवसीय उदयपुर प्रवास को सफलतापूर्वक पूर्ण किया।
उदयपुर की धरती को आध्यात्मिक ऊर्जा, सद्भावना, नशामुक्ति और नैतिकता का अलौकिक संदेश देने के बाद आचार्यश्री गुरुवार प्रातः अपने अगले विहार की ओर अग्रसर हुए।
उदयपुरवासियों ने अपने आराध्य के श्रीचरणों में कृतज्ञता प्रकट की और मंगल आशीष प्राप्त कर स्वयं को धन्य अनुभव किया। उदयपुर की यह आध्यात्मिक यात्रा आने वाले समय में नागरिकों के जीवन मूल्यों पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ने वाली सिद्ध होगी।

🌼 आचार्यश्री का 11 किमी का प्रेरणादायी विहार
आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल साधु-साध्वी मंडली के साथ नाथद्वारा मार्ग पर अग्रसर हुए।
विहार के दौरान:
मार्ग में अनेक स्थानों पर भव्य स्वागत हुआ
नागरिकों ने श्रद्धा से दर्शन किए
आचार्यश्री ने सभी को आशीर्वाद प्रदान किया
पहाड़ी क्षेत्र के टनल मार्ग से प्रवेश करते हुए आचार्यश्री आगे बढ़े
लगभग 11 किलोमीटर का कठिन और प्रेरणादायी विहार पूर्ण करने के बाद आचार्यश्री बिलोता में स्थित ढाबालोजी रेस्टोरेंट परिसर में पधारे। यहाँ भक्तों में विशेष उत्साह और भक्ति उमड़ी।

🌼 मुख्य मंगल प्रवचन : आत्मवाद का सिद्धांत और उसका जीवन में महत्व
प्रातःकालीन मंगल प्रवचन में आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनसमूह को गहन आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान की।
उन्होंने “आत्मवाद” को जीवन का केंद्रीय सिद्धांत बताते हुए कहा:
🔹 आत्मा और शरीर अलग हैं
आत्मा शाश्वत है, शरीर नश्वर है।
जीवन के दौरान आत्मा और शरीर का संयोग रहता है।
मृत्यु के बाद शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो जाता है और आत्मा आगे के गति-पथ पर चल देती है।

🔹 पुनर्जन्म का सिद्धांत क्यों?
आचार्यश्री ने तर्कपूर्ण ढंग से समझाया कि पुनर्जन्म का कारण चार कषाय हैं—
क्रोध, मान, माया और लोभ।
ये कषाय ऐसे “जल” हैं जो पुनर्जन्म रूपी वृक्ष को सिंचित करते रहते हैं।
जब तक मोहनीय कर्म का नाश नहीं होता, जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है।
🔹 मोक्ष की प्राप्ति
कषायों के क्षय होने पर आत्मा:
जन्म-मरण से मुक्त
कर्मबंधन से परे
शुद्ध, स्वतंत्र और प्रकाशमयी हो जाती है
यह अवस्था ही मोक्ष कहलाती है।

🌼 अध्यात्म का सार : जीवन को व्यर्थ न जाने दें
आचार्यश्री ने जीवन परिवर्तन का सरल मार्ग बताते हुए कहा:
🔹 आत्मवाद को मानना क्यों आवश्यक?
क्योंकि आत्मा के अस्तित्व और पुनर्जन्म पर विश्वास रखने से मनुष्य:
अपने कर्मों के प्रति सावधान रहता है
जीवन को उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करता है
पापाचार और भ्रष्टाचार से दूर रहता है
अहिंसा, संयम और नैतिकता की राह पकड़ता है
🔹 मानवीयता सर्वोपरि
आचार्यश्री ने यह भी कहा कि:
> “अणुव्रती बनने के लिए जैनी होना आवश्यक नहीं।
तेरापंथ धर्मसंघ से जुड़ना अनिवार्य नहीं।
यदि मनुष्य में मानवीयता, सद्भावना, नैतिकता और संयम है तो जीवन में शांति स्वयं आ जाती है।”
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🔹 वर्तमान और भविष्य दोनों का कल्याण
यदि व्यक्ति:
सद्भावना रखे
अहिंसा को अपनाए
अच्छे कर्म करे
पापों से बचे
तो उसका वर्तमान और भविष्य दोनों संवरते हैं।
अच्छे कर्म अच्छे जीवन की नींव हैं।
🌼 आचार्यश्री का सामाजिक संदेश : सदाचार ही सच्चा धर्म
आचार्यश्री ने समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया कि:
नशामुक्ति अपनाएं
भ्रष्टाचार से दूर रहें
परिवार में शांति बनाए रखें
समाज में सद्भावना फैलाएं
नैतिक मूल्यों को जीवन में उतारें
आज के समय में यह संदेश समाज की वास्तविक आवश्यकता बन चुका है।

🌼 आध्यात्मिक यात्रा का महत्व
आचार्यश्री महाश्रमणजी की यात्राएँ केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक यात्राएँ हैं।
उनके संवाद और मंगल प्रवचन:
मन को शांति देते हैं
जीवन में सकारात्मकता भरते हैं
युवा पीढ़ी को संयम मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं
समाज को व्यसनों से मुक्त करने का संदेश देते हैं
उनकी उपस्थिति मात्र से ही वातावरण धर्ममय और पवित्र हो जाता है।
🌼 स्वागत-अभिनंदन
ढाबालोजी रेस्टोरेंट परिसर में संस्थान के ऑनर श्री पारस बोल्या ने:
आचार्यश्री का स्वागत किया
आस्थासिक्त भाव व्यक्त किए
आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं को सौभाग्यशाली बताया
भक्तों में भी गहरा उत्साह देखा गया और सभी ने आचार्यश्री के उपदेशों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
🌸 Udaipur:आत्मवाद को मानकर पापाचरणों से बचने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण🌸


